मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, May 12, 2015

"फासले इतने न अब पैदा करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
हौसले के साथ में आगे बढ़ो
फासले इतने न अब पैदा करो।

जिन्दगी तो है हकीकत पर टिकी,
मत इसे जज्बात में रौंदा करो।

चाँद-तारों से भरी इस रात में,
उल्लुओं सी सोच मत रक्खा करो।

बुलबुलों से ज़िन्दगी की सीख लो,
राग अंधियारों का मत छेड़ा करो।

उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
हारकरथककर न यूँ बैठा करो।

छोड़कर शिकवें-गिलों की बात को,
मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।

खूबसूरत दिल सजा हर जिस्म में,
 “रूप पर इतना न मत ऎंठा करो।

Tuesday, January 13, 2015

क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .



नहीं वे जानते मुझको,  दुश्मनी करके बैठे हैं ,
मेरे कुछ मिलने वाले भी,  उन्हीं से मिलके बैठे हैं ,
समझकर वे मुझे कायर,  बहुत खुश हो रहे नादाँ
क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .
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गिला वे कर रहे आकर , हमारे गुमसुम रहने का ,
गुलूबंद को जो कानों से , लपेटे अपने बैठे हैं .
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हमें गुस्ताख़ कहते हैं , गुनाह ऊँगली पे गिनवाएं ,
सवेरे से जो रातों तक , गालियाँ दे के बैठे हैं .
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नतीजा उनसे मिलने का , आज है सामने आया ,
पड़े हम जेल में आकर , वे घर हुक्का ले बैठे हैं .
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रखे जो रंजिशें दिल में , कभी न वो बदलता है ,
भले ही अपने होठों पर , तबस्सुम ले के बैठे है .
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नज़ीर ''शालिनी '' की ये , नज़रअंदाज़ मत करना ,
कहीं न कहना पड़ जाये , मियां तो लुट के बैठे हैं .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

Tuesday, November 25, 2014

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया


अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया
नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गया
उसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं
वो गुफ़्तगू के लिए, माहताब छोड़ गया
गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर
ये क्या तिलिस्म है, कैसा सराब छोड़ गया
सहर के डूबते तारे की तरह बन 'श्रद्धा'
हरिक दरीचे पे जो आफ़ताब छोड़ गया
- 'श्रद्धा' जैन
शब्दार्थ:
1. ↑ बातचीत
2. ↑ चाँद
3. ↑ आकृति
4. ↑ सुबह
5. ↑ खिड़की
6. ↑ सूरज

Tuesday, July 1, 2014

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं -Shakeel Jamali

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं
सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं
इक बीमार वसीयत करने वाला है
रिश्ते नाते जीभ निकाले बैठे हैं

बस्ती का मामूल पे आना मुश्किल है
चौराहे पर वर्दी वाले बैठे हैं

धागे पर लटकी है इज़्ज़त लोगों की
सब अपनी दस्तार सँभाले बैठे हैं

साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ायब है
घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं

आज शिकारी की झोली भर जाएगी
आज परिंदे गर्दन डाले बैठे हैं

Friday, June 27, 2014

ये कौन बोल रहा है ख़ुदा के लहजे में...

कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में
अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में

ये वक़्त किस की रुऊनत पे ख़ाक डाल गया
ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में

न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है
हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में

खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है
अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में

यही है मसलहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर
हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में

{इफ़्तिख़ार आरिफ़}

Tuesday, June 24, 2014

"आज से ब्लॉगिंग बन्द" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
फेस बुक पर मेरे मित्रों में एक श्री केवलराम भी हैं। 
उन्होंने मुझे चैटिंग में आग्रह किया कि उन्होंने एक ब्लॉगसेतु के नाम से एग्रीगेटर बनाया है। अतः आप उसमें अपने ब्लॉग जोड़ दीजिए। 
मैेने ब्लॉगसेतु का स्वागत किया और ब्लॉगसेतु में अपने ब्लॉग जोड़ने का प्रयास भी किया। मगर सफल नहीं हो पाया। शायद कुछ तकनीकी खामी थी।
श्री केवलराम जी ने फिर मुझे याद दिलाया तो मैंने अपनी दिक्कत बता दी।
इन्होंने मुझसे मेरा ईमल और उसका पासवर्ड माँगा तो मैंने वो भी दे दिया।
इन्होंने प्रयास करके उस तकनीकी खामी को ठीक किया और मुझे बता दिया कि ब्लॉगसेतु के आपके खाते का पासवर्ड......है।
मैंने चर्चा मंच सहित अपने 5 ब्लॉगों को ब्लॉग सेतु से जोड़ दिया।
ब्लॉगसेतु से अपने 5 ब्लॉग जोड़े हुए मुझे 5 मिनट भी नहीं बीते थे कि इन महोदय ने कहा कि आप ब्लॉग मंच को ब्लॉग सेतु से हटा लीजिए।
मैंने तत्काल अपने पाँचों ब्लॉग ब्लॉगसेतु से हटा लिए।
अतः बात खत्म हो जानी चाहिए थी। 
---
कुछ दिनों बाद मुझे मेल आयी कि ब्लॉग सेतु में ब्लॉग जोड़िए।
मैंने मेल का उत्तर दिया कि इसके संचालक भेद-भाव रखते हैं इसलिए मैं अपने ब्लॉग ब्लॉग सेतु में जोड़ना नहीं चाहता हूँ।
--
बस फिर क्या था श्री केवलराम जी फेसबुक की चैटिंग में शुरू हो गये।
--
यदि मुझसे कोई शिकायत थी तो मुझे बाकायदा मेल से सूचना दी जानी चाहिए थी । लेकिन ऐसा न करके इन्होंने फेसबुक चैटिंग में मुझे अप्रत्यक्षरूप से धमकी भी दी।
एक बानगी देखिए इनकी चैटिंग की....
"Kewal Ram
आदरणीय शास्त्री जी
जैसे कि आपसे संवाद हुआ था और आपने यह कहा था कि आप मेल के माध्यम से उत्तर दे देंगे लेकिन आपने अभी तक कोई मेल नहीं किया
जिस तरह से बिना बजह आपने बात को सार्जनिक करने का प्रयास किया है उसका मुझे बहुत खेद है
ब्लॉग सेतु टीम की तरफ से फिर आपको एक बार याद दिला रहा हूँ
कि आप अपनी बात का स्पष्टीकरण साफ़ शब्दों में देने की कृपा करें
कोई गलत फहमी या कोई नाम नहीं दिया जाना चाहिए
क्योँकि गलत फहमी का कोई सवाल नहीं है
सब कुछ on record है
इसलिए आपसे आग्रह है कि आप अपन द्वारा की गयी टिप्पणी के विषय में कल तक स्पष्टीकरण देने की कृपा करें 24/06/2014
7 : 00 AM तक
अन्यथा हमें किसी और विकल्प के लिए बाध्य होना पडेगा
जिसका मुझे भी खेद रहेगा
अपने **"
--
ब्लॉग सेतु के संचालकों में से एक श्री केवलराम जी ने मुझे कानूनी कार्यवाही करने की धमकी देकर इतना बाध्य कर दिया कि मैं ब्लॉगसेतु के संचालकों से माफी माँगूँ। 
जिससे मुझे गहरा मानसिक आघात पहुँचा है।
इसलिए मैं ब्लॉगसेतु से क्षमा माँगता हूँ।
साथ ही ब्लॉगिंग भी छोड़ रहा हूँ। क्योंकि ब्लॉग सेतु की यही इच्छा है कि जो ब्लॉगर प्रतिदिन अपना कीमती समय लगाकर हिन्दी ब्लॉगिंग को समृद्ध कर रहा है वो आगे कभी ब्लॉगिंग न करे।
मैंने जीवन में पहला एग्रीगेटर देखा जिसका एक संचालक बचकानी हरकत करता है और फेसबुक पर पहल करके चैटिंग में मुझे हमेशा परेशान करता है।
उसका नाम है श्री केवलराम, हिन्दी ब्लॉगिंग में पी.एचडी.।
इस मानसिक आघात से यदि मुझे कुछ हो जाता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी ब्लॉगसेतु और इससे जुड़े श्री केवलराम की होगी।
आज से ब्लॉगिंग बन्द।
और इसका श्रेय ब्लॉगसेतु को।
जिसने मुझे अपना कीमती समय और इंटरनेट पर होने वाले भारी भरकम बिल से मुक्ति दिलाने में मेरी मदद की।
धन्यवाद।

डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"

Thursday, May 15, 2014

मजदूर कभी नींद की गोली नही खाते

हसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे है तो क्यो शौक से मिट्ठी नहीं खाते

तुझ से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन
तुझसे न मिलेंगे ये कसम  भीं नही खाते

सो जाते है फुटपाथ पे अखबार बिछाकर
मजदूर कभी नींद की गोली नही खाते

बच्चे भी गरीबी को समझने लगे शायद
अब जाग भी जाते है तो सहरी नहीं खाते

दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे कलंदर
हर एक के पैसे की दवा भी नहीं खाते

अल्लाह गरीबो का मददगार है 'राना'
हम लोगो के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते - मुनव्वर राना 

शब्दार्थ :
सहरी = सूरज निकलने से पहले सुबह की अजान होने से पहले किय जाने वाला भोजन। 

Read more: http://www.jakhira.com/2014/05/haste-hue-maa-baap.html#ixzz31l9msUo3

Sunday, March 23, 2014

.....सियासत के काफिले .

हमको बुला रहे हैं सियासत के काफिले ,
सबको लुभा रहे हैं सियासत के काफिले .
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तशरीफ़ आवरी है घडी इंतखाब की,
दिल को भुना रहे हैं सियासत के काफिले .
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तसलीम कर रहे हैं हमें आज संभलकर ,
दुम को दबा रहे हैं सियासत के काफिले .
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न देते हैं मदद जो हमें फ़ाकाकशी में ,
घर को लुटा रहे हैं सियासत के काफिले .
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मख़मूर हुए फिरते हैं सत्ता में बैठकर ,
मुंह को धुला रहे हैं सियासत के काफिले .
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करते रहे फरेब हैं जो हमसे शबो-रोज़ ,
उनको छुपा रहे हैं सियासत के काफिले .
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फ़ह्माइश देती ''शालिनी'' अवाम समझ ले ,
तुमको घुमा रहे हैं सियासत के काफिले .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]
शब्दार्थ-तशरीफ़ आवरी-पधारना ,इंतखाब-चुनाव ,फाकाकशी-भूखो मरना ,मखमूर-नशे में चूर

Friday, January 17, 2014

651 उर्दू शायरों की सात हजार गजलें

नई दिल्ली। उर्दू शायरी के नाम वेबसाइट 'रेख्ता' ने एक साल में ही लोगों के बीच खास जगह बना ली है। उन लोगों के लिए यह खास है जो उर्दू के ज्यादा जानकार नहीं, मगर उर्दू की मिठास के कायल हैं। शनिवार को रेख्ता की सालगिरह के मौके कई नामी शायर और उर्दू के कद्रदां इकट्ठा हुए। 
'रेख्ता', उर्दू शायरी की एक बड़ी वेबसाइट है। उर्दू से गहरा लगाव रखने वाले उद्योगपति संजीव सराफ इसके फाउंडर हैं। इस जश्न के मौके पर केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद बतौर चीफ गेस्ट मौजूद थे। साथ ही सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया के चेयरमैन यू.के. सिन्हा, फिल्मकार मुजफ्फर अली, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व वाइस चांसलर सय्यद शाहिद मेहदी, लेखक शम्सुरर्हमान फारूकी, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नायर, प्रो. शमीम हनफी, उद्योगपति कमल मोरारका, दिल्ली उर्दू अकादमी के चेयरमैन अख्तरउल वासे भी प्रोग्राम में शामिल हुए। 
एक साल पूरे होने के मौके पर वेबसाइट को नया लुक भी दिया गया है। साथ ही, नया कलेक्शन भी अपडेट किया गया है। सादत हसन मंटो के फैंस को यहां उनकी सभी कहानियां मिलेंगी। वेबसाइट में 651 उर्दू शायरों की सात हजार गजलें और नज्में हैं। इस वेबसाइट का सबसे नायाब पहलू यह है कि इसमें उर्दू शायरी को देवनागरी और रोमन लिपियों में भी पेश किया गया है। वेबसाइट को अब तक 154 देशों के करीब ढाई लाख लोग देख चुके हैं।
एक रिपोर्ट साभार
नोट: नई बात यह है कि किसी भी शब्द का अर्थ जानने के लिए बस उस पर क्लिक करना काफ़ी है. देखें-

Thursday, December 19, 2013

अब आ पड़ी मियां की जूती मियां के सर .

Muslim bride and groom at the mosque during a wedding ceremony - stock photo
फिरते थे आरज़ू में कभी तेरी दर-बदर ,
अब आ पड़ी मियां की जूती मियां के सर .
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लगती थी तुम गुलाब हमको यूँ दरअसल ,
करते ही निकाह तुमसे काँटों से भरा घर .
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पहले हमारे फाके निभाने के थे वादे ,
अब मेरी जान खाकर तुम पेट रही भर .
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कहती थी मेरे अपनों को अपना तुम समझोगी ,
अब उनको मार ताने घर से किया बेघर .
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पहले तो सिर को ढककर पैर बड़ों के छूती ,
अब फिरती हो मुंह खोले न रहा कोई डर .
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माँ देती है औलाद को तहज़ीब की दौलत ,
मक्कारी से तुमने ही उनको किया है तर .
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औरत के बिना सूना घर कहते तो सभी हैं ,
औरत ने ही बिगाड़े दुनिया में कितने नर .
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माँ-पिता,बहन-भाई हिल-मिल के साथ रहते ,
आये जो बाहरवाली होती खटर-पटर .
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जीना है जो ख़ुशी से अच्छा अकेले रहना ,
''शालिनी ''चाहे मर्दों के यूँ न कटें पर .
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शालिनी कौशिक
[WOMAN ABOUT MAN]

Saturday, November 2, 2013

यूँ इक सबक़-ए-महर-ओ-वफ़ा छोड़ गए हम

यूँ इक सबक़-ए-महर-ओ-वफ़ा छोड़ गए हम
हर राह में नक़्श-ए-कफ़-ए-पा छोड़ गए हम

दुनिया तेरे क़िर्तास पे क्या छोड़ गए हम
इक हुस्न-ए-बयाँ हुस्न-ए-अदा छोड़ गए हम

माहौल की ज़ुल्मात में जिस राह से गुज़रे
क़िंदील-ए-मोहब्बत की ज़िया छोड़ गए हम

बेगाना रहे दर्द-ए-मोहब्बत की दवा से
ये दर्द ही कुछ और सिवा छोड़ गए हम

थी सामने आलाइश-ए-दुनिया की भी इक राह
वो ख़ूबी-ए-क़िस्मत से ज़रा छोड़ गए हम

इक हुस्न-ए-दकन था के निगाहों से न छूटा
हर हुस्न को वरना बा-ख़ुदा छोड़ गए हम

रचनाकार: जगन्नाथ आज़ाद

Saturday, August 10, 2013

तमन्नाओं के बाज़ार में

तमन्नाओं के बाज़ार में
दुकानें तो बहुत सजाई मैंने
मगर खरीददार नहीं आया कोई
जो भी आया बेचैनी बेच गया 
बदले में सुकून ले गया
पहले ही मुफलिस-ऐ -सुकून था
अब पूरी तरह मुफलिस हो गया

मुफलिस,तमन्ना,मुफलिस--सुकून,सुकून
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Thursday, August 8, 2013

ईद मुबारक के साथ ही सभी को हरियाली तीज की शुभकामनायें

Eid-Mubarak-Flowers-HD-Wallpapers 2013 Fb Facebook Pics Beautiful

ईद मुबारक के  साथ ही सभी को हरियाली तीज की  शुभकामनायें 

 मुबारकबाद सबको दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
महक इस मौके में भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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मुब्तला आज हर बंदा ,महफ़िल -ए -रंग ज़माने में ,
मिलनसारी यहाँ भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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मुक़द्दस दूज का महताब ,मुकम्मल हो गए रमजान ,
शमा हर रोशन अब कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे ,
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रहे मज़लूम न कोई ,न हो मज़रूह हमारे से ,
मरज़ हर दूर अब कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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ईद खुशियाँ मनाने को ,ख़ुदा का सबको है तौहफा ,
मिठास मुरौव्वत की भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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भुलाकर मज़हबी मुलम्मे ,मुहब्बत से गले मिल लें ,
मुस्तहक यारों का कर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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फ़तह हो बस शराफत की ,तरक्की पाए बस नेकी ,
फरदा यूँ हरेक कर दूँ ,जुदा अंदाज़  हैं मेरे .
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फरहत बख्शे फरिश्तों को ,खुदा खुद ही यहाँ आकर ,
फलक इन नामों से भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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फ़िरासत से खुदा भर दे ,बधाई ''शालिनी ''जो दे ,
फिर उसमे फुलवारी भर दूँ ,जुदा अंदाज़ हैं मेरे .
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शब्दार्थ -मजलूम -अत्याचार से पीड़ित ,मजरूह-घायल ,मुरौव्वत-मानवता ,मुलम्मे-दिखावे ,मुस्तहक-अधिकारी ,फरदा -आने वाला  दिन ,फरहत-ख़ुशी ,फरिश्तों -सात्विक वृति वाला व्यक्ति। फ़िरासत -समझदारी।   
    और ईद मुबारक के  साथ ही सभी को हरियाली तीज की  शुभकामनायें 


   
                             शालिनी कौशिक 
                                          [कौशल ]

Saturday, July 20, 2013

यही वो वाहिद प्यार है जिस में बेवफ़ाई नहीं होती eternal love


फ़ना  कर दे अपनी सारी ज़िन्दगी ख़ुदा  की मुहब्बत में 
यही वो वाहिद प्यार है जिस में बेवफ़ाई नहीं होती 

अर्थ:
वाहिद-एक 

Monday, July 15, 2013

Sunday, July 7, 2013

गालिबन ये हमारी ही ,करम रेखों का साया है .



A Hindu devotee tries to take a holy dip in the flooded waters of river Ganges in the northern Indian town of Haridwar
गरजकर ऐसे आदिल ने ,हमें गुस्सा दिखाया है .

ख़ुदा ने आज़माया है ,अज़ाब हम पर आया है .
किया अजहद ज़ुल्म हमने ,अदम ने ये बताया है .


कस्साबी नारी सहे ,मुहं सी आदमजाद  की .
इन्तहां ज़ुल्मों की उसपर ,उफान माँ का लाया है .




करे खिलवाड़ कुदरत से ,आज के इन्सां बेखटके ,
खेल अपना दिखा रब ने ,कहकहा यूँ लगाया है .


गेंहू के संग में है पिसती ,सदा घुन ही ये बेचारी ,
किसी की कारस्तानी का ,किसी को फल चखाया है .


लूटकर बन्दों को उसके ,खजाने अपने हैं भरते ,
सभी को जाना है खाली ,काहे इतना जुटाया है .


खबीस काम कर-करके ,खरा करने मुकद्दर को ,
पहुंचना रब की चौखट पर ,बवंडर ये मचाया है .


कुफ्र का बढ़ना आदम में ,समझना खिलक़त से बढ़कर ,
चूर करने को मदहोशी ,सबक ऐसे सिखाया है .


गज़ब पड़ना अजगैबी का ,हदें टूटी बर्दाश्त की ,
गरजकर ऐसे आदिल ने ,हमें गुस्सा दिखाया है .


समझ लें आज कबीले ,सहमकर कहती ''शालिनी '',
गालिबन ये हमारी ही ,करम रेखों का साया है .


शब्दार्थ-अजगैबी-दैवी ,अजहद-बहुत ,आज़माना -परीक्षा लेना ,अज़ाब-पाप के बदले में मिलने वाला फल ,अदम-परलोक,काहे -किसलिए ,उफान-उबाल,आदमजाद-आदमी,आदिल-इंसाफ करने वाला ,कस्साबी-कसाई का काम ,कुफ्र-नास्तिकता ,खबीस-नापाक,खरा -निष्कपट,गज़ब पड़ना -अचानक भरी संकट पड़ना ,गालिबन-सम्भावना है कि,करम रेख-भाग्य में लिखी हुई बात .

     शालिनी कौशिक 
             [कौशल]


Monday, July 1, 2013

कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

orange rosesbouquet of spring roses 1


   न बदल पायेगा तकदीर तेरी कोई और ,
      तेरे हाथों में ही बसती है तेरी किस्मत की डोर ,
   अगर चाहेगा तो पहुंचेगा तू बुलंदी पर 
      तेरे जीवन में भी आएगा तरक्की का एक दौर .


तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने ,
    दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी .
 जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत ,
      कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .


तकदीर बनाने के लिए सुनले मेहरबां,
     दिल में जीतने का हमें जज्बा चाहिए .
छूनी है अगर आगे बढ़के तुझको बुलंदी 
      क़दमों में तेरे जोश और उल्लास चाहिए .


मायूस होके रुकने से कुछ होगा न हासिल ,
    उम्मीद के चिराग दिल में जलने चाहियें .
चूमेगी कामयाबी आके माथे को तेरे 
     बस इंतजार करने का कुछ सब्र चाहिए .


क्या देखता है बार-बार हाथों को तू अपने ,
   रेखाओं में नहीं बसती है तकदीर किसी की .
गर करनी है हासिल तुझे जीवन में बुलंदी 
   मज़बूत इरादों को बना पथ का तू साथी .

             शालिनी कौशिक 

                    [कौशल]

Thursday, June 27, 2013

बजरिये बख्शीश-ए-लोहा ,सोयी जनता जगायेंगे .


If Narendra Modi and Rahul Gandhi are all we get as options for prime minister, any other leader from the yet to be formed Third Front for the top job is not unwelcome at all. Neither the Congress-it\'s still cagey about its choice-nor the BJP-it has more or less decided on Modi-present us with a choice that is difficult to resist.

Neither Modi nor Rahul fit into the definition of a leader of a country with huge complexities. The latter is still discovering and making sense of India and the former firmly believes that India is an extension of Gujarat and all intricate problems confronting India, be it the area of economy or foreign affairs, render themselves to simplistic solutions. Both pretend to be outsiders impatient with the state of the polity. Both want to be the agent of the great change, but neither the powerful articulation of Modi nor the indecipherable silence of Rahul really tell us whether they are good enough for the task.
 Gandhinagar: Gujarat Chief Minister Narendra Modi today announced a nation-wide campaign to collect small pieces of iron from farmers for using it to build the proposed \'Statue of Unity\' in the memory of Sardar Vallabhbhai Patel.
 
On the day of Sardar Patel\'s birth anniversary on 31 October 2013, we will launch a nation-wide campaign, covering more than five lakh villages throughout the country to collect small pieces of iron of any tool used by farmers from each village, that will be used in the building the statue, Modi said in Gandhinagar before his inaugural address at the all India conference on livestock and dairy development 
बजरिये बख्शीश-ए-लोहा ,सोयी जनता जगायेंगे .
फिर एक नयी इबारत गढ़ ,साथ सबको ले आयेंगे .


भले ही दृढ इरादों ने ,उन्हें लौह-पुरुष बनाया था ,
ढालकर उनको मूरत में ,लोहा तो ये दिलवाएंगे .


मिटटी के लौंदे में लिपटे ,वे तो साधारण मानव थे .
महज़ लोहमय शख्सियत को ,लोहसार ये बनायेंगे .


मुखालिफ ने लगायी थी ,शहर में खुद की ही मूरत .
उसने खुद दम पर था खाया ,ये दूजे का खा जायेंगे .


उड़ायें ये मखौल उनके ,जो बनके लग गए हैं मूरत .
भला खुद बनवाये बुत की ,हंसी को रोक पाएंगे .


न खाने को हैं दो रोटी ,न तन ढकने को हैं कपडे .
ऐसे में इन इरादों से ,क्या जीवन ये दे पाएंगे .


फैलसूफी  में अपनी ये ,रहनुमा बनने आये हैं .
राहजनी खुलेआम करके ,उड़नछू ये हो जायेंगे .


रियाया अपनी समझकर ,रियायत ऐसे करते हैं .
साँस की एवज में लोहा ,ये सबसे लेकर जायेंगे .


बघंबर पहनकर आये ,असल में ये हैं सौदागर .
''शालिनी''ही नहीं इनको ,सभी पहचान जायेंगे .

शब्दार्थ:-बजरिये-के द्वारा ,बख्शीस-दान,लोहसार -फौलाद,इस्पात ,फैलसूफी-धूर्तता ,रियाया -प्रजा ,रियायत-मेहरबानी ,बघंबर-बाघ की खाल

   शालिनी कौशिक