मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, May 25, 2011

क्यों हुआ ईमान नदारद ?


वो रोज़ ही पूजा के लिए जाते हैं मंदिर
मंदिर से मगर मन के है भगवान नदारद
तादाद में बढ़ने लगे हैं हर जा पे नमाज़ी
सज्दों से मगर क्यों हुआ ईमान नदारद 
  
-असद रज़ा


शब्दार्थ 
जा-जगह
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11 comments:

Neelam said...

सज्दों से मगर क्यों हुआ ईमान नदारद
behadd umda.

डा. श्याम गुप्त said...

बगैर सोचे समझे तादाद बढेगी तो गुणवत्ता तो कम होगी ही...

Dr. Ayaz Ahmad said...

बहुत खूब

मदन शर्मा said...

सुन्दर रचना
बहुत सच कहा है...

मदन शर्मा said...

अनवर जमाल जी ! बिना निमंत्रण के आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ

Bhushan said...

आदमी के भीतर से इमान अक़सर ग़ायब होता रहता है. बार-बार की पूजा-नमाज़ उसके अंदर रोशनी करती रहती है ताकि वो देख सके कि उसका इमान अपनी जगह क़ायम है.

शालिनी कौशिक said...

vah nahi kah sakti kyonki ye sachchai hai aajki jo sharmnak hai.aapki prastuti sarahniy hai.

शिखा कौशिक said...

वाह ! बहुत खूब ,

Sawai Singh Rajpurohit said...

बहुत सच कहा है और सुन्दर प्रस्तुति..

anju choudhary..(anu) said...

bahut khub.....har dil mei bhagwan basta hai......ab aisa kahan kaha jata hai...

Vaanbhatt said...

अपने घर (दिल) में कहीं ख़ुदा रखना...