ये चाह कब है मुझे सब-का-सब जहान मिले,
मुझे तो मेरी जमीं, मेरा आसमान मिले।
कमी नहीं है सजावट की इन मकानों में,
सुकून भी तो कभी इनके दरमियान मिले।
अजीब वक्त है सबके लबों पे ताले हैं,
नजर नजर में मगर अनगिनत बयान मिले।
जवां हैं ख्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के,
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले।
हमारा शहर या ख्वाबों का कोई मक़तल है,
क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले।
हो जिसमें प्यार की खुशबू, मिठास चाहत की,
हमारे दौर को ऐसी भी इक जुबान मिले।
--नीरज
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23 hours ago




14 comments:
ये चाह कब है मुझे सब-का-सब जहान मिले,
मुझे तो मेरी जमीं, मेरा आसमान मिले।बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........
बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 13-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ
BAHUT SUNDAR PRASTUTI .AABHAR
बहुत सुन्दर और सार्थक रचना!
ये चाह कब है मुझे सब-का-सब जहान मिले,
मुझे तो मेरी जमीं, मेरा आसमान मिले।बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.
शानदार गज़ल
जवां हैं ख्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के,
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले।
एक एक शेर जज्बातों की धरोहर है, आभार।
जवां हैं ख्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के,
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले।
हमारा शहर या ख्वाबों का कोई मक़तल है,
क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले।
Wah jamal sahab kya khoob likhte hain .
जवां हैं ख्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के,
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले।
हमारा शहर या ख्वाबों का कोई मक़तल है,
क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले।
Wah jamal sahab kya khoob likhte hain .
बेहतरीन गज़ल...
सांझा करने का शुक्रिया सर.
Sundar abivyakti
lajabab, behtarin, dilkash
वाह ...बहुत बढि़या।
बहुत उम्दा ग़ज़ल... वाह!
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