मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, July 10, 2012

शीशा हमें तो आपको पत्थर कहा गया

                      ग़ज़ल


शीशा हमें तो आपको पत्थर कहा गया
दोनों के सिलसिले में ये बेहतर कहा गया

ख़ुददारियों की राह पे जो गामज़न रहे
उनको हमारे शहर में ख़ुदसर कहा गया

इक मुख्तसर सी झील न जो कर सका उबूर
इस दौर में उसी को शनावर कहा गया

उसने किया जो ज़ुल्म तो हुआ न कुछ भी ज़िक्र
मैंने जो कीं ख़ताएं तो घर घर कहा गया

मैं ही वो सख्त जान हूं कि जिसके वास्ते
तपती हुई चट्टान को बिस्तर कहा गया

- ताज़ीज़ बस्तवी, रहमत गंज, गांधी नगर, बस्ती

11 comments:

अरूण साथी said...

दोनों के सिलसिले में ये बेहतर कहा गया

साधु-साधु

रविकर फैजाबादी said...

यह है बुधवार की खबर ।

उत्कृष्ट प्रस्तुति चर्चा मंच पर ।।



आइये-

सादर ।।

DR. ANWER JAMAL said...

उसने किया जो ज़ुल्म तो हुआ न कुछ भी ज़िक्र
मैंने जो कीं ख़ताएं तो घर घर कहा गया

Marhabaa ...

vandana said...

बढ़िया गज़ल

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

पाषाणों की चोट से, शीशा जाता टूट।
लेकिन वो झुकता नहीं, रहा हलाहल घूँट।।

Kunwar Kusumesh said...

बढ़िया.

Rajesh Kumari said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल
उसने किया जो ज़ुल्म तो हुआ न कुछ भी ज़िक्र
मैंने जो कीं ख़ताएं तो घर घर कहा गया
ये शेर तो बहुत शानदार है

शिवनाथ कुमार said...

उसने किया जो ज़ुल्म तो हुआ न कुछ भी ज़िक्र
मैंने जो कीं ख़ताएं तो घर घर कहा गया

बहुत खूब .....

Neetu Singhal said...

उस आबे-दीद-ए-जोश को मंजर कहा गया..,
बाद आबादाने दस्त को बंजर कहा गया.....

Neetu Singhal said...

इक ताबदाँ तस्वीर देखकर कहा गया..,
आबमीन गुले-शाख को शज़र कहा गया.....

Nitish Tiwary said...

bahut khoob.
yahan bhi padharen.
http://iwillrocknow.blogspot.in/